Saturday, 16 December 2023

प्राणायाम जीवन का मूल आधार | Pranayam's basic foundation of life

 

pranayama
Pranayama
'प्राणायाम' प्राणवायु को नियंत्रित करने की प्रक्रिया है। हमारे प्राचीन ऋषियों का मानना था कि प्रत्येक जीव के सांसो की संख्या निश्चित होती है। जिव यदि उस सांस को अव्यवस्थित रूप से वह व्यय करता है, तो वह 1 दिन अपनी जीवनी शक्ति गवाकर अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है। यदि व प्राणायाम के द्वारा अपनी सांसो को नियंत्रित करके 'ध्यान' लगाए, तो ना केवल उसकी प्रत्येक सांस की अवधि लंबी हो जाती है, बल्कि वह इससे अपनी शारीरिक एवं मानसिक चेतना को बढ़ाकर अपने जीवन की निर्धारित सांसों की संख्या को बढ़ा भी सकता है।


इस सिद्धांत पर अनेक  ऋषियों द्वारा प्रयोग एवं अन्वेषण होते रहे हैं और यह भी खोज निकाला गया कि सांसो के प्रभाव से शरीर एवं जीवन शक्ति का नास समान रूप में ही होता है। प्राणायाम के द्वारा शरीर को सांसो के विनाशक प्रभाव से बचाया जा सकता है और कालजयी जीवन (इसका अर्थ अमर नहीं है, बल्कि दीर्घ जीवन है) प्राप्त किया जा सकता है। यही कारण है कि प्राचीन ऋषि-मुनि लंबे समय तक प्राणायाम के माध्यम से समाधि में चले जाते थे। उस समय उनकी सांस नहीं चलती थी, इसलिए शरीर काल के प्रभाव से अछूता रहता था।


प्राणायाम के माध्यम से ही सिद्ध योगी अपने सूक्ष्म शरीर को स्थूल शरीर से अलग करके अंतरिक्ष में विचरण किया करते थे।


पश्चिमी विज्ञान के सिद्धांतों से प्रभावित लोग सूक्ष्म शरीर की मान्यता का मजाक उड़ाते नजर आते हैं, किंतु यह शरीर प्रत्येक जीव में है और इसका स्वरूप पूर्णतया वैज्ञानिक है। भारतीय योग, तंत्र एवं तप के तमाम प्रयोगों में इस सूक्ष्म शरीर की रचना का प्रयोग किया जाता है।


"उदाहरण स्वरुप प्राणायाम की साधना का अभ्यास करने के पश्चात योगीगण इसकी सहायता से कुंडलिनी को जागृत करने का प्रयत्न करते हैं। इस कुंडलिनी का अस्तित्व सूक्ष्म शरीर में ही है। इसके चक्रों की रचना, आकृति और स्थान का जो विवरण योग शास्त्र में दिया गया है वैसी कोई भी रचना स्थूल के उस भाग में नहीं है"।


बहुत से लोग यह प्रश्न उठाते हैं कि जब सूक्ष्म शरीर को देखा नहीं जा सकता, तो उसके अस्तित्व पर कैसे विश्वास किया जाए? एक तो यह सिद्धांत ही अज्ञानता पूर्ण है कि जो भी इंद्रियों के द्वारा अनुमति में आता है, वही सत्य है। क्योंकि हमारी अनुभूति किसी शाश्वत मापदंड में नहीं बंधी हुई है। नित नए आविष्कार हो रहे हैं और उसके होने से पहले वह सिद्धांत हमारे ज्ञान में नहीं होता। इसीलिए यह दावा करना वज्र मूर्ख का कार्य है कि जो कुछ भी वह जानता है, संसार का सत्य वही तक है।


सूक्ष्म शरीर और उसकी ऊर्जा की तरंगों का अनुभव हम प्राणायाम के अभ्यास से कर सकते हैं। यदि हमने कुण्डलिनी पर 'ध्यान' लगाया तो 3 से 6 महीने के अंदर उसकी विलक्षण शक्ति का अनुभव होने लगता है। उसके प्रारंभिक चक्रों का भी अनुभव होने लगता है।

No comments:

Post a Comment

Please do not enter any spam link in the comment box.