योगवेदिकस्वस्थ तन, शांत मन
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Monday, 25 December 2023

क्या आप अपना कल सुरक्षित कर रहे है ? | Are you securing your tomorrow?

 

Plants in hand
Plants in hand
एक दिन की बात है। एक बकरी को शिकारी कुत्ते ने घास चाड़ते देख लिया। शिकारी कुत्ते ने धीरे-धीरे उस बकरी  के तरफ बढ़ने लगा, जैसे ही उस बकरी की नज़र उस शिकारी कुत्ते पर पड़ी। बकरी समझ गई कि, आज ये शिकारी कुत्ता मुझे नहीं छोड़ेगा और उस कुत्ते को देखते ही बकरी तुरंत भागने लगी ।


वह शिकारी कुत्ता भी तेजी से दौड़ने लगा, उस बकरी को खाने के लिए। अब बकरी आगे-आगे और शिकारी कुत्ता पीछे-पीछे भागने लगे। बकरी अपना जान बचाने के लिए भागते भागते एक झाड़ी में घुस गई और कुत्ता आगे निकल गया।


अब बकरी निश्चिंतापूर्वक उस झाड़ी की हरी हरी पत्ती खाना शुरू कर दिया और जमीन से लेकर अपने गर्दन पहुंचे तक उस दूरी तक पत्ते खा लिए। अब झाड़ी में पत्ती नहीं रही , बकरी साफ-साफ देखी जा सकती थी। अब बकरी का छिपने का सहारा ख़त्म हो गया और बकरी का छिपने का सहारा ख़त्म हो जाने के कारण कुत्ते ने उस बकरी को देख लिया और उसे मार डाला।


"दोस्तो इस कहानी का तात्पर्य यह है कि सहारा देने वालो को कभी भी नष्ट ना करे, क्योंकि जो सहारा देने वालों को नष्ट करता है उसकी भी बकरी की तरह ही दुर्गति होती है यानी परिणाम बहुत ही भयंकर होता है"।

        
दोस्तो अगर आज की हालात को देखे तो कुछ ऐसा ही है, क्योंकि हम सभी, जो भी हमारा सहारा देने वाले प्राकृतिक संसाधन है इस पृथ्वी पर हमसब उसका नुकसान पहुंचा रहे है। जैसे आज सहारा देने वालीं जीवन दायिनी नदियां, पेड़ पौधो, जानवर, गाय, पर्वतो आदि को नुकसान पंहुचा रहे है और इन सभी का परिणाम भी अनेक आपदाओ के रूप में हम सब भोग रहे है।



इन सभी परिणामों से बचने के लिए हमें प्रत्येक प्राकृतिक सम्पदा को बचना चाहिए, जिससे आने वाला कल हमारे बच्चों का  सुरक्षित हो सके।

Wednesday, 20 December 2023

मैं आत्मा, जो हमेशा से है हमेशा रहेगी | I am soul who is always exist and alive


सारी जिन्दगी हम इस शरीर के लिएे भागते रहते है जो कि एक दिन अवश्यमेव छोड़ना पड़ेगा । हम यदि अभी भी यह समझ जायें कि हम शरीर नही है, शरीर तो एक दिन छोड़ना होगा । छोड़ेगा कौन ? मैं आत्मा, जो हमेशा से है हमेशा रहेगी। 

यह मनुष्य जीवन मिला ही हमें इसीलिये है कि हम यह समझ सकें कि मैं हूँ कौन ?

हम (आत्मा) 84 लाख योनियों में जिस भी शरीर मे गये उसी शरीर को हमने मैं (मैं यह शरीर हुँ) मान लिया, और उसी के लिएे यह 4 चार काम करने लगा,

१ शरीर का पेट भरना ।
२ सोना ( निद्रा) ।
३ सन्तानोप्ति (Sex)
४ शरीर की रक्षा

इस मानव शरीर को पाकर भी क्या हम यही चार कार्य नहिं कर रहें है क्या यह सोचें ?

हमें यह मनुष्य जीवन मिला है अपनी आत्मा का पेट भरने के लिये क्या मैनें  आत्मा का पेट भरने का प्रयत्न किया नहि किया तो कब करुँगा, इस मानव तन के रहते रहते ही हम आत्मा का पेट भरने का प्रयत्न कर सकते है, मानव शरीर छिन जाने के बाद नही, फिर पता नही कब यह मानव शरीर  मिले ? 

हिन्दू धर्म के 16 संस्कार में यज्ञोपवीत संस्कार | 16 sacraments of sacred thread in Hindu religion


हिन्दू धर्म के 16 संस्कार में यज्ञोपवीत संस्कार

ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात्।

आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥

प्रजापति ने स्वाभाविक रूप से जनेऊ निर्माण किया है। जनेऊ का धागा कच्चे सूत से बना हुआ होता है। जनेऊ को व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर इस प्रकार पहना जाता है कि दाईं कमर के नीचे तक पहुच जाये। यह आयु, विद्या, यश और बल को बढ़ानेवाला है।

हिंदू धर्म के महत्त्वपूर्ण 16 संस्कारों में एक संस्कार जनेऊ / यज्ञोपवीत संस्कार भी है । भारतीय हिन्दू धर्म में 16 संस्कार निम्नलिखित है।

      गर्भाधान

      पुंसवन

      सीमन्तोन्नयन

      जातकर्म

      नामकरण

      निष्क्रमण

      अन्नप्राशन

      चूड़ाकर्म

      विद्यारम्भ

      कर्णवेध

      यज्ञोपवीत / जनेऊ

      वेदारम्भ

      केशान्त

      समावर्तन

      विवाह

      अन्त्येष्टि

जनेऊ / यज्ञोपवीत संस्कार न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी बहुत महत्त्वपूर्ण  है।

*जनेऊ के तीन सूत्र के सम्बन्ध में मत्त्वपूर्ण बातें !*

यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं।

यह तीन सूत्र सत्व, रजस् और तमस् का प्रतीक है।

यह तीन सूत्र शरीर में उपस्थित प्राण शक्ति इडा, पिंगला तथा सुषुम्ना नाड़ी का प्रतीक है।

यह तीन सूत्र गायत्री मंत्र विद्यमान चरणों का प्रतीक है।

यह तीन सूत्र तीन आश्रमों ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ का प्रतीक है।

यह तीन सूत्र  तीनो काल  भूतकाल, वर्तमानकाल तथा भविष्यतकाल का भी प्रतीक है।

यह काल रक्षक के रूप में भी प्रतिष्ठित है।

यह तीन सूत्र  त्रिदोष कफ, पित्त तथा वात्त को भी नियंत्रित करता है। 

*जनेऊ में उपसूत्र*

जनेऊ में कुल ९ सूत्र और उपसूत्र होते है।  ऊपर तीन सूत्र बताया गया है परन्तु प्रत्येक तीन सूत्रों तीन तीन उपसूत्र होते है इस प्रकार कुल ९ सूत्र और उपसूत्र हो जाते है। इस तरह कुल सूत्रों की संख्या नौ हो जाती है। नौ सूत्रों का संकेत निम्न प्रकार से है –

मुख,     1

नसिका  2

आंख     2 

कान     2

मूत्र द्वार  1

मल द्वार 1  

इस प्रकार सभी मिलकर कुल 9 हो जाते हैं। इसका अर्थ है कि हम मुख से सत्य और प्रिय वचन बोले और खाएं, नेत्रो से सूंदर देंखे और कानों से सुवचन सुने।

*जनेऊ की लंबाई कितनी होती है*

जनेऊ/यज्ञोपवीत की लंबाई भी निश्चित होती है ।जनेऊ बनाते समय लम्बाई का विशेष ध्यान रखा जाता है। यदि लम्बाई कम है तो वह दोष माना जाता है। जनेऊ की लम्बाई 96 अंगुल होती है। जनेऊ की लम्बाई यह सूचित करता है कि जो भी इसे धारण करें उसे  32 विद्याओं (चार वेद, चार उपवेद, छह अंग, छह दर्शन, तीन सूत्रग्रंथ, नौ अरण्यक ) और 64 कलाओं को जानने और सीखने का प्रयास करना चाहिए। 64 कलाओं में जैसे- साहित्य कला, कृषि ज्ञान, वास्तु निर्माण, व्यंजन कला, चित्रकारी,  दस्तकारी, भाषा, यंत्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी, आभूषण निर्माण आदि।

*जनेऊ में कितने गाँठ होते है*

जनेऊ /यज्ञोपवीत में पांच गाँठ लगाई जाती है जो  धर्म, अर्ध, काम, मोक्ष और ब्रह्म का प्रतीक है। यह पांच यज्ञों, ऋषि यज्ञ, देव यज्ञ, बलि वैष्वानर यज्ञ, अतिथि यज्ञ व पितृ यज्ञ नामक पांच यज्ञों का नित्य विधान बताया गया है।  पञ्च ज्ञानेद्रियों (आंख कान नाक त्वचा जिह्वा) और पंच कर्मों का  प्रतीक है।

*जनेऊ धारण करने की आयु*

प्राचीन काल में जब गुरुकुल की परम्परा थी उस समय प्राय: 8  वर्ष की उम्र में यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न हो जाता था। इसके बाद बालक पढने के लिए गुरुकुल चला जाता था। यज्ञोपवीत संस्कार से ही बालक को ब्रह्मचर्य की दीक्षा दी जाती थी जिसका पालन गृहस्थाश्रम में आने से पूर्व तक किया जाता था। इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य अनुशासित जीवन व्यतीत करने से है।

जनेऊ धारण करने का उम्र मुख्यतौर पर बालक के जन्म से ब्राह्मण 8 वें वर्ष में, क्षत्रिय 11 वे, तथा वैश्य 12 वे वर्ष में यज्ञोपवीत धारण  करें। किसी  कारणवश इस काल विशेष में यज्ञोपवीत संस्कार नहीं हो सका तो  ब्राह्मण 16 वें वर्ष में, क्षत्रिय 22 वे, तथा वैश्य 24 वे वर्ष में यज्ञोपवीत संस्कार करा सकते है। ब्राम्हण का वसंत ऋतु में, क्षत्रिय का ग्रीष्म में और वैश्य का उपवीत शरद ऋतु में होना चाहिए।

*वैज्ञानिक दृष्टि में जनेऊ का महत्त्व*

वैज्ञानिक दृष्टि से भी जनेऊ पहनना स्वास्थ्य के दृष्टि से लाभदायक है। यह हमें स्वस्थ्य बनाये रखने में सहायता करता है। 

जनेऊ के हृदय मध्य से गुजरता है अतः यह हृदय रोग से बचाता है।

हमारे कान में एक नस होता है जीका  जिसका सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क से होता है जब जनेऊ  के माध्यम  से यह नस दबता है है तो मस्तिष्क की कोई सोई हुई तंद्रा कार्य करने लगती है जो हमें स्मरण शक्ति एवम विवेकशक्ति बढ़ाने में कार्य करती है।

हमारे दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।

मल-मूत्र करने से पहले जनेऊ को  हम कानों पर कस कर दो बार लपेटते हैं जिससे कान के पीछे की नसें, जिनका संबंध पेट की आंतों से होता है,नस के दबने से आंतों पर भी दबाव पड़ता है जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है।

कान के पास ही एक ऐसा नस होता है जो मल-मूत्र विसर्जन के समय सक्रिय होता है उससे कुछ द्रव्य निकलता है। जनेऊ उस द्रव्य को रोक देता है, जिससे पेट के रोग,  कब्ज, एसीडीटी,  मूत्रन्द्रीय रोग,  हृदय के रोग, रक्तचाप जैसे अन्य संक्रामक रोग होने से रोकते है।

यह हमें बार-बार आने वाले  बुरे स्वप्नों से भी मुक्ति दिलाती है | कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी जाग्रत हो जाता है जिससे मनुष्य में दिव्यता बनी रहती है।

जनेऊ पाचन संस्थान को ठीक करता है और पेट तथा शरीर के निचले अंगों में विकार नहीं लाने देता है। जनेऊ ‘एक्यूप्रेशर’ के विकल्प के रूप में भी कार्य करता है। जनेऊ हमें लकवा अथवा पक्षाघात बीमारियों से बचाता है। 

Monday, 18 December 2023

भारत की संस्कृति को पहचाने | Recognize India's Culture

 *भारत की संस्कृति को पहचाने !*

*ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुचाये.!*
*खासकर अपने बच्चो को बताए क्यों कि ये बात उन्हें कोई नहीं बताएगा...*

             *⌛दो पक्ष⌛*
१-कृष्ण पक्ष ,    २-शुक्ल पक्ष❗

        *🙏तीन ऋण🙏*
१-देवऋण , २-पितृऋण, ३-ऋषिऋण❗

         *🏉चार युग🏉*
१-सतयुग ,  २-त्रेतायुग ,
३-द्वापरयुग ,  ४-कलियुग❗

        *🌷चार धाम🌷*
१-द्वारिका , २-बद्रीनाथ ,
३-जगन्नाथपुरी , ४-रामेश्वरमधाम❗

       *🕹चार पीठ🕹*
१-शारदा पीठ *(द्वारिका)*
२-ज्योतिष पीठ *(जोशीमठ बद्रिधाम*) 
३-गोवर्धन पीठ *(जगन्नाथपुरी),*
४-शृंगेरीपीठ❗

          *⌛चार वेद⌛*
१-ऋग्वेद , २-अथर्ववेद ,३-यजुर्वेद , ४-सामवेद!

            *🍁चार आश्रम🍁*
१-ब्रह्मचर्य , २-गृहस्थ , ३-वानप्रस्थ , ४-संन्यास❗

           *🏉चार अंतःकरण🏉*
१-मन , २-बुद्धि , ३-चित्त , ४-अहंकार❗

          *🍁पञ्च गव्य🍁*
१-गाय का घी , २-दूध , 
दही ,३-गोमूत्र , ४-गोबर❗

         *🙏पञ्च देव🙏*
१-गणेश , २-विष्णु , ३-शिव , ४-देवी ,५-सूर्य

          *🕹पंच तत्त्व🕹*
१-पृथ्वी ,२-जल , ३-अग्नि(तेज) , ४-वायु , ५-आकाश❗

        *⌛छह (षट्दर्शन) दर्शन⌛*
१-वैशेषिक , २-न्याय ,३-सांख्य , ४-योग , ५-पूर्व मिसांसा , ६-उत्तर मिसांसा❗

       *🌷  सप्त ऋषि🌷*
१-विश्वामित्र ,२-जमदाग्नि ,३-भरद्वाज , ४-गौतम , ५-अत्री , ६-वशिष्ठ और कश्यप❗

          *🍁सप्त पुरी🍁*
१-अयोध्यापुरी ,२-मथुरापुरी ,
३-मायापुरी *(हरिद्वार)*, ४-काशीपुरी ,
५-कांचीपुरी *(शिन कांची-विष्णु कांची),*
६-अवंतिकापुरी और 
७-द्वारिकापुरी❗

          *⌛आठ योग⌛*
१-यम , २-नियम , ३-आसन ,४-प्राणायाम , ५-प्रत्याहार , ६-धारणा , ७-ध्यान, एवं ८-समािध❗

          *🙏आठ लक्ष्मी🙏*
१-आग्घ , २-विद्या , ३-सौभाग्य ,४-अमृत , ५-काम , ६-सत्य , ७-भोग ,एवं ८-योग लक्ष्मी❗

             *🌹नव दुर्गा 🌹*
१-शैल पुत्री , २-ब्रह्मचारिणी ,३-चंद्रघंटा , ४-कुष्मांडा , ५-स्कंदमाता , ६-कात्यायिनी ,७-कालरात्रि, ८-महागौरी एवं ९-सिद्धिदात्री❗

       *🍫 दस दिशाएं🍫*
१,पूर्व , २-पश्चिम , ३-उत्तर , ४-दक्षिण ,५-ईशान , ६-नैऋत्य , ७-वायव्य , ८-अग्नि 
९-आकाश, एवं १०-पाताल,❗

               *🏉मुख्य ११ अवतार🏉*
 १-मत्स्य , २-कश्यप , ३-वराह , ४-नरसिंह , ५-वामन , ६-परशुराम ,७-श्री राम , ८-कृष्ण , -बलराम , १०-बुद्ध एवं ११-कल्कि❗

         *🍁बारह मास🍁*
१-चैत्र , २-वैशाख , ३-ज्येष्ठ ,४-अषाढ , ५-श्रावण , ६-भाद्रपद , ७-अश्विन , ८-कार्तिक ,९-मार्गशीर्ष , १०-पौष , ११-माघ , १२-फागुन❗

       *⌛ बारह राशी ⌛*
१-मेष , २-वृषभ , ३-मिथुन , ४-कर्क , ५-सिंह , ६-कन्या , ७-तुला , ८-वृश्चिक , ८-धनु , १०-मकर , ११-कुंभ , १२-कन्या❗

           *🙏बारह ज्योतिर्लिंग🙏*
१-सोमनाथ ,२-मल्लिकार्जुन ,३-महाकाल , ४-ओमकारेश्वर , ५-बैजनाथ , ६-रामेश्वरम ,७-विश्वनाथ , ८-त्र्यंबकेश्वर , ९-केदारनाथ , १०-घुष्मेश्वर, ११-भीमाशंकर ,१२-नागेश्वर!

       *💥पंद्रह तिथियाँ💥*
१-प्रतिपदा ,२-द्वितीय ,३-तृतीय ,४-चतुर्थी , ५-पंचमी , ६-षष्ठी , ७-सप्तमी , ८-अष्टमी , ९-नवमी ,१०-दशमी , ११-एकादशी , १२-द्वादशी , १३-त्रयोदशी , १४-चतुर्दशी , १५-पूर्णिमा, अमावास्या❗

           *🕹स्मृतियां🕹*
१-मनु , २-विष्णु , ३-अत्री , ४-हारीत ,५-याज्ञवल्क्य ,७-उशना , ७-अंगीरा , ८-यम , ९-आपस्तम्ब , १०-सर्वत ,१०-कात्यायन , १२-ब्रहस्पति , १३-पराशर , १४-व्यास , १५-शांख्य , १६-लिखित , १७-दक्ष , 
१८-शातातप , १९-वशिष्ठ