Sunday, 13 November 2022

योगमुद्रासन करने की विधि और लाभ I Yogmudra Asana - Steps, Posture & Benefits of Yogamudra Asana

November 13, 2022 0 Comments

योगमुद्रासनकरने की विधि और लाभ l Yogamudra Asana - Steps, Posture & Benefits of Yogamudra Asana

Yog-mudra-asana
Yogmudra asana 

योगमुद्रा आसन - योग में योग मुद्रा का बड़ा महत्व है. यह अनेक रोगों को दूर करता है. साथ-साथ शरीर को लचीला और सुडौल बनाता है. इस आसन को करने से विभिन्न आसन लगाने में सुविधा होती है. यह संपूर्ण शरीर का व्यायाम है.


योगमुद्रा आसन करने का प्रायोगिक विधि - योगमुद्रा आसन लगाने के लिए सर्वप्रथम पद्मासन की मुद्रा में बैठे. दोनों बांहों को मोड़ कर हाथों को पीठ के पीछे ले जाएं और हाथ से दूसरे हाथ की कलाई पकड़ ले और अपने दृष्टि को सामने की ओर सीधी रखें.


आपकी कमर, रीढ़, पीठ एवं गर्दन भी सीधी होनी चाहिए. लंबी सांस लें. आंखें बंद करके धीरे-धीरे रेचक करें (सांस बाहर निकालिए) पेट को पिचका कर सामने की ओर झुकिए, इतना झुकिए कि आपका सिर भूमि से सटे, फिर सांस रोके हुए इस मुद्रा में कुछ देर रहें.


लंबे समय तक योग मुद्रा आसन करने में सांस को रोकना आवश्यक नहीं है, किंतु इसकी गति-धीमी होनी चाहिए.


योगमुद्रा आसन में ध्यान - योगमुद्रा आसन संपूर्ण शारीरिक व्यायाम है. प्रत्येक पेशियां एवं अंग इस आसन के अभ्यास से स्वस्थ होते हैं लेकिन 'ध्यान' लगाने के लिए इस आसन का प्रयोग करने से मस्तिष्क की चेतन तिरंगे शक्तिशाली होती है. सिर की नाड़ियों में रक्त का गमन नियंत्रित होता है.


सिर (माथा) धरती पर लगाने से ललाट का ऊपरी हिस्सा धरती के समीप आता है इससे त्राटक बिंदु पर दबाव पड़ता है इस अवस्था से एकाग्रता प्राप्त करना आसान होता है.


योगमुद्रा आसन करने से लाभ - योगमुद्रा आसन में ध्यान लगाने से मंदाग्नि समाप्त होती है, बदहजमी दूर होती है. कोष्ठबध्दता समाप्त होती है. शरीर की पेशियां, नाड़िया, स्नायु आदि मजबूत, लचीले एवं स्वस्थ होते हैं इस आसन में मधुमेह एवं मोटापा दूर होता है.


इस आसन में 'ध्यान' लगाने से शरीर के प्रत्येक अंग की कांति, त्वचा की चमक, दृष्टि को शक्ति, बालों की बीमारियां आदि दूर होते है. इस आसन को करने से मानसिक एवं बौद्धिक लाभ असीमित है इन लाभों की प्राप्ति 'ध्यान' के अस्तर के अनुसार होती है.


योगमुद्रा करने से पहले कुछ सावधानियां - उत्तर दिशा की ओर मुंह करके आसन ना लगाएं. यह एक कठिन आसन है. इसके लिए सर्वप्रथम पद्मासन का अभ्यास करें. सिर (माथा) भूमि पर टिकाने में प्रारंभ में कठिनाई होती है. इस आसन को करने में जल्दी बाजी ना करें इस आसन को धीरे-धीरे करें और इस पर काबू पाएं, इस आसन को निरंतर अभ्यास से इसमें सफलता मिलेगी.


3.5 सेकंड से प्रारंभ करके इसे 15 मिनट तक किया जा सकता है, किंतु सामान्यतः 5 मिनट ही बहुत है इस आसन को करने के लिए.


Sunday, 6 November 2022

वज्रासन करने की विधि और इसके लाभ I How To Do The Vajrasana And What Are Its Benefits

November 06, 2022 0 Comments

Vajrasana and it's benefits
Vajrasana and it's benefits


वज्रासन - व्रज का अर्थ कठोर एवं सख्त होता है. लेकिन योग में इस आसन को वज्रासन इसीलिए कहा जाता है कि यह वज्रनाड़ी पर प्रभाव डालने वाला आसन है. वज्रनाड़ी गुदा और अंडकोष के मध्य में होती है.



वज्रासन करने से पहले सावधानियाॅं - उत्तर की ओर मुंह करके आसन ना लगाएं. पैरों को नितंबों के नीचे खड़े करके ना बैठे. उसे लेटने की मुद्रा में रखें. गुदा मार्ग दोनों पैरों के बीच में होना चाहिए. इस आसन को लगाने से प्रारंभ में पैरों में कुछ दर्द हो सकता है पर प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा निरंतर अभ्यास करते रहें और सरसों तेल की मालिश करें जिससे इस आसन पर आसानी से नियंत्रण किया जा सके.



वज्रासन करने की प्रायोगिक विधि-  "दोनों टांगो को पीछे की ओर मोड़कर घुटनों के बल बैठ जाइए. पैरों के तलवे ऊपर की ओर हों और पैर लेटी हुई मुद्रा में हो. दोनों नितम्ब एड़ियों और पैरों पर टिके हों. दोनों पैरों के अंगूठों को एक-दूसरे में मिला दें. दोनों हथेलियों को घुटनों पर रखें और बाहों को ढीली छोड़ दें. हाथों की अंगुलियों को एक-दूसरे से फॅंसाया भी जा सकता है. इसमें पूरक एवं रेचक दोनों सांसे चलती है."



वज्रासन में ध्यान - इस आसन में त्राटक बिंदु का अभ्यास किया जाता है.



वज्रासन करने से लाभ - इस आसन को करने से बदहजमी, कब्ज, थकावट आदि दूर करने में यह आसन सहायक है. इस में ध्यान लगाने का लाभ ध्यान के अस्तर के अनुसार होता है. इस आसन से वात, साइटिका, पैरों की नसों के विकार आदि दूर होते हैं. यह एक सरल आसन है जो आसानी से किया जा सकता है. इस आसन को खाने के तुरंत बाद भी किया जा सकता है. इस आसन को करने से मन शांत होता है. इस आसन को करने से भोजन में युक्त विटामिंस और मिनरल्स को शरीर ज्यादा शोषित करता है.

Saturday, 5 November 2022

What is Yog in hindi | योग क्या है और योग कितने प्रकार के होते है

November 05, 2022 0 Comments



योग क्या है

आप योग के नाम से समझ सकते है योग का मतलब होता है "जोड़" , पर अब बात आती है किसका किसके साथ "जोड़" 
योग वह कला है जिसको करने से आप अपने मन को  उस परम् शक्ति एवं परम् ज्ञान से जुड़ सकते है जिसको आपको अनुभूति होती है.


प्राचीन भारतीयों ने ज्ञान को खोजने की एक अनूठी तकनीक अपनायी थी, यहाँ प्रयोग, परिक्षण और निरीक्षण बाहर नहीं बल्कि मानव शरीर और मन पर किये गए है जो कुछ मानव शरीर में है वही ब्रह्माण्ड में है. ज्ञान प्राप्ति का माध्य्म कोई दूरबीन, खुर्तबिन  अथवा रासायन  नहीं थे द्रेष्टा खुद ही दूरबीन, खुर्तबिन बनने लगता था. ये माना गया है कि देखने वाला का चित्त जितना एकाग्र, शांत और शुद्ध होगा उसकी दृष्टि भी उतनी ही स्पष्ट होगी. चित्त को एकाग्र करने की विधि ही "योग" है.


इसलिए योग यहाँ के दर्शन, कला और विज्ञान में छुपा पारा है मगर योग की एकाग्रता का एक खास उद्देश्य है जैसे आयुर्वेद शरीर की बीमारी दूर करता है वैसे ही योग में चित्त की बीमारी  दुःख का ईलाज़ करता है.


योग सूत्र में चार अध्याय है


1 ) समाधिपाद

2) साधनपाद

3) विभूतिपाद

4) कैवल्यपाद है 


आम आदमी को योग की सुरुआत दूसरे अध्याय साधनपाद से करनी होती है. यहाँ योग के आठ अंगों को क्रमवार  समझाया गया है.


1) यम

2) नियम

3) आसन

4) प्राणायाम

5) प्रत्याहार

6) धारणा

7) ध्यान

8) समाधी


1) यम - यम पाँच है.


i) अहिंसा

ii) सत्य

iii) अस्तेय

iv) अपरिग्रह

v) ब्रह्ममचर्य


2) नियम - नियम भी पाँच ही है.


i) शौच

ii) संतोष

iii) तप

iv) स्वाध्याय

v) ईश्वरप्रणिधान


ईश्वरप्रणिधान - ईश्वरप्रणिधान को पतंजलि ने चित निरुद्ध करने के एक उपाय के रूप में परिभाषित किया है वो जगत का करता हंता या नियंता नहीं है वो सिर्फ चेतना की एक ऐसी इकाई है जो प्राकृति के बंधन से मुक्त है. योग का दर्शन सांख्य है और वो ईश्वर को नहीं मानता, इसीलिए  कई बार धार्मिक पुरोहितो ने योग के दर्शन का विरोध किया है और उसमें धार्मिक तत्व मिलाने की कोशिस भी की है. धर्म में आस्था चाहिए लेकिन योग पूरी तरह अस्तिववादी, अनुभववादी और प्रयोगात्मक है.


3) आसन - अपने दैनिक आचरण को इन यमो और नियमो द्वारा संयमित और नियमित करने के बाद साधक किसी आसन में बैठता था। आसन शरीर की वो स्तिथि है जो सुखमय और आरामदायक हो शरीर हिलना नहीं चाहिए. दृष्टि या तो नासाग्रह पर हो या फिर किसी बिंदु या भू-मध्य पर. जब एक ही आसन में कई घंटों तक लगातार बैठने का अभ्यास हो जाता है तो शरीर में दृढ़ता आती है और चित्त की अनंत में स्तिथि हो जाती है। 


4) प्राणायाम - जब शरीर स्थिर हो जाये तो स्वांश को नियंत्रित और सूक्ष्म करने की प्रकिया को प्राणायाम कहते है. प्राणायाम से चित्त तो निर्मल होता ही है इससे चेतना की नाड़िया भी शुद्ध होती है. सूक्ष्म और निरुद्ध होता साँस चंचल से चंचल मन को भी काबू करने में सामर्थ्य रखता है. प्राणायाम के बाद मन को बाहरी विषयो से हटाकर अंदर लगाने का अभ्यास किया जाता है.  हमारा जीवन इंद्रियें विषियो के शब्द , स्पर्श , रूप, रस और गंध रुपी आहार से चलता है. 


5) प्रत्याहार - इस बाहरी आहार को रोक कर अंतःकरण से उल्टा आहार ग्रहण करने का नाम ही प्रत्याहार है.


6) धारणा - जब किसी बिंदु पर चित रूक-रूक कर ठहरने लगे तो इसे धारणा कहते है। धारणा के लिए किसी मूर्त या अमूर्त विषय या विचार को सहारा बनाया जा सकता है.


7) ध्यान - धारणा ही लंबी होकर ध्यान बन जाती है.


8) समाधी - ध्यान ही लंबा होकर समाधी बन जाता है. समाधी को आप मनुष्य के होने की सुद्धतम और स्थायी स्तिथि कह सकते है.