Saturday, 5 November 2022

What is Yog in hindi | योग क्या है और योग कितने प्रकार के होते है



योग क्या है

आप योग के नाम से समझ सकते है योग का मतलब होता है "जोड़" , पर अब बात आती है किसका किसके साथ "जोड़" 
योग वह कला है जिसको करने से आप अपने मन को  उस परम् शक्ति एवं परम् ज्ञान से जुड़ सकते है जिसको आपको अनुभूति होती है.


प्राचीन भारतीयों ने ज्ञान को खोजने की एक अनूठी तकनीक अपनायी थी, यहाँ प्रयोग, परिक्षण और निरीक्षण बाहर नहीं बल्कि मानव शरीर और मन पर किये गए है जो कुछ मानव शरीर में है वही ब्रह्माण्ड में है. ज्ञान प्राप्ति का माध्य्म कोई दूरबीन, खुर्तबिन  अथवा रासायन  नहीं थे द्रेष्टा खुद ही दूरबीन, खुर्तबिन बनने लगता था. ये माना गया है कि देखने वाला का चित्त जितना एकाग्र, शांत और शुद्ध होगा उसकी दृष्टि भी उतनी ही स्पष्ट होगी. चित्त को एकाग्र करने की विधि ही "योग" है.


इसलिए योग यहाँ के दर्शन, कला और विज्ञान में छुपा पारा है मगर योग की एकाग्रता का एक खास उद्देश्य है जैसे आयुर्वेद शरीर की बीमारी दूर करता है वैसे ही योग में चित्त की बीमारी  दुःख का ईलाज़ करता है.


योग सूत्र में चार अध्याय है


1 ) समाधिपाद

2) साधनपाद

3) विभूतिपाद

4) कैवल्यपाद है 


आम आदमी को योग की सुरुआत दूसरे अध्याय साधनपाद से करनी होती है. यहाँ योग के आठ अंगों को क्रमवार  समझाया गया है.


1) यम

2) नियम

3) आसन

4) प्राणायाम

5) प्रत्याहार

6) धारणा

7) ध्यान

8) समाधी


1) यम - यम पाँच है.


i) अहिंसा

ii) सत्य

iii) अस्तेय

iv) अपरिग्रह

v) ब्रह्ममचर्य


2) नियम - नियम भी पाँच ही है.


i) शौच

ii) संतोष

iii) तप

iv) स्वाध्याय

v) ईश्वरप्रणिधान


ईश्वरप्रणिधान - ईश्वरप्रणिधान को पतंजलि ने चित निरुद्ध करने के एक उपाय के रूप में परिभाषित किया है वो जगत का करता हंता या नियंता नहीं है वो सिर्फ चेतना की एक ऐसी इकाई है जो प्राकृति के बंधन से मुक्त है. योग का दर्शन सांख्य है और वो ईश्वर को नहीं मानता, इसीलिए  कई बार धार्मिक पुरोहितो ने योग के दर्शन का विरोध किया है और उसमें धार्मिक तत्व मिलाने की कोशिस भी की है. धर्म में आस्था चाहिए लेकिन योग पूरी तरह अस्तिववादी, अनुभववादी और प्रयोगात्मक है.


3) आसन - अपने दैनिक आचरण को इन यमो और नियमो द्वारा संयमित और नियमित करने के बाद साधक किसी आसन में बैठता था। आसन शरीर की वो स्तिथि है जो सुखमय और आरामदायक हो शरीर हिलना नहीं चाहिए. दृष्टि या तो नासाग्रह पर हो या फिर किसी बिंदु या भू-मध्य पर. जब एक ही आसन में कई घंटों तक लगातार बैठने का अभ्यास हो जाता है तो शरीर में दृढ़ता आती है और चित्त की अनंत में स्तिथि हो जाती है। 


4) प्राणायाम - जब शरीर स्थिर हो जाये तो स्वांश को नियंत्रित और सूक्ष्म करने की प्रकिया को प्राणायाम कहते है. प्राणायाम से चित्त तो निर्मल होता ही है इससे चेतना की नाड़िया भी शुद्ध होती है. सूक्ष्म और निरुद्ध होता साँस चंचल से चंचल मन को भी काबू करने में सामर्थ्य रखता है. प्राणायाम के बाद मन को बाहरी विषयो से हटाकर अंदर लगाने का अभ्यास किया जाता है.  हमारा जीवन इंद्रियें विषियो के शब्द , स्पर्श , रूप, रस और गंध रुपी आहार से चलता है. 


5) प्रत्याहार - इस बाहरी आहार को रोक कर अंतःकरण से उल्टा आहार ग्रहण करने का नाम ही प्रत्याहार है.


6) धारणा - जब किसी बिंदु पर चित रूक-रूक कर ठहरने लगे तो इसे धारणा कहते है। धारणा के लिए किसी मूर्त या अमूर्त विषय या विचार को सहारा बनाया जा सकता है.


7) ध्यान - धारणा ही लंबी होकर ध्यान बन जाती है.


8) समाधी - ध्यान ही लंबा होकर समाधी बन जाता है. समाधी को आप मनुष्य के होने की सुद्धतम और स्थायी स्तिथि कह सकते है.


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