स्वाभाविक है कि यदि इसे व्यायाम के रूप में अपनाया जाए तो सभी प्रकार के रोगों को दूर करने में सहायक होता है।
लेकिन यह सदा स्मरण रखें की 'योग साधना' का उद्देश्य उस चेतना की शुद्धि एवं शक्ति का विकास करना है जो शरीर ही नहीं मन का भी संचालक है। सभी प्रकार की बीमारियों की जड़ मन की विकृति है। हमारे मन में यदि निराशा है, तो हमारा रक्तचाप गिर जाएगा, पेट में कब्ज हो जाएगी, अपच की शिकायत हो जाएगी, गैस बनेगी, सर के बाल झड़ेंगे, या सफेद होने लगेंगे, चेहरे पर झुर्रियां पड़ जाएंगी, आंखों के नीचे काली छाया उभर जाएगी।
इसी प्रकार क्रोध में हमारा रक्तचाप बढ़ जाता है। नेत्र के तंतु प्रभावित होते हैं। मस्तिष्क की नारियां फूलने-पिचकने लगती है। इससे इनकी स्वभाविक स्थिति में परिवर्तन हो जाता है । क्रोध से रक्त में विषाक्त तत्व उत्पन्न होते हैं । इससे रक्त दूषित होता है अनेक प्रकार की बीमारियां रक्त के दूषित होने से उसे अपनी गिरफ्त में ले लेती है।
यदि मन की शुद्धि नहीं हुई, तो शरीर में विषाक्त तत्व बनते रहेंगे। आप उसे व्यायाम के द्वारा ठेल कर बाहर निकालते रहेंगे। व्यर्थ ही जीवन भर श्रम करते रहना होगा । इसमें आपको मानसिक शांति, उत्साह, उल्लास, आदि केवल आसन के अभ्यास से नहीं मिल पाएगा । मस्तिष्क का क्षेत्र 'ध्यान' का है। ध्यान लगाकर ही आप शारीरिक एवं मानसिक स्वस्थता को प्राप्त कर सकते हैं। सांसारिक मामलों की सफलता में भी यह आपको सहायता देगा ।

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